UA-166045260-1 The Hijab Files: भारत में पर्दे का इतिहास - Islamic Way Of Life

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Wednesday, 23 March 2022

The Hijab Files: भारत में पर्दे का इतिहास

 The Hijab Files: भारत में पर्दे का इतिहास

हिजाब को लेकर कर्नाटक हाई कोर्ट का एक फिसला आया है जिसमे कहा गया है कि कुरआन में कहीं हिजाब के बारे में जिक्र नहीं है। सवाल ये है कि क्या वाकई कुरान में हिजाब के बारे में नहीं लिखा है? या अन्य धर्मों में भी हिजाब(पर्दा) के बारे में कुछ कहा गया है?

अगर कुरान में हिजाब के बारे में कहीं वर्णन है तो आखिर कर्नाटक के छात्राओं के साथ ऐसा भेदभाव क्यों किया गया?

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विभिन्न धर्मों में परदे का स्वरूप
कुरआन में महिलाओं के हक में बहुत सारी आयतें हैं जैसे कि पुत्रों की तरह ही पुत्रियों को भी जायदाद में हिस्सा देना चाहिए। औरतों की इज्जत करनी चाहिए,निकाह के वक्त दहेज हराम है लेकिन मेहर के तौर पर अपनी पत्नी को उसकी मर्जी के अनुसार उसे धन,कपड़े,गहने वगैरह देना,बिना लड़की की मर्जी के शादी ना करना,लड़की के कुबुलियत के बाद ही शादी का जायज माना जाना,गुलाम औरतों को भी आजाद करवाना और उनसे निकाह करके समाज में जगह देना।यहां तक कि ये भी कहा गया है कि मां के पांव के नीचे जन्नत है। 

इसी संदर्भ में आधा दर्जन आयतों में सिर्फ महिलाओं के परिधान और रहन सहन के बारे में उल्लेखित है। 

आइए कुछ आयतों को पढ़ते हैं और उसका मतलब समझते हैं।

يَا بَنِي آدَمَ قَدْ أَنزَلْنَا عَلَيْكُمْ لِبَاسًا يُوَارِي سَوْآتِكُمْ وَرِيشًا وَلِبَاسُ التَّقْوَى ذَلِكَ خَيْرٌ ذَلِكَ مِنْ آيَاتِ اللَّهِ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ

ऐ आदम की सन्तान! हमने तुम्हारे लिए वस्त्र उतारा है कि तुम्हारी शर्मगाहों को छुपाए और रक्षा और शोभा का साधन हो। और धर्मपरायणता का वस्त्र - वह तो सबसे उत्तम है, यह अल्लाह की निशानियों में से है, ताकि वे ध्यान दें।

(Quran: Surah Name: الأعراف Verse: 26)

सूरह 24 अन नूर;आयत 30,और 31 में कहा गया है:-

और ईमानवाली स्त्रियों से कह दो कि वे भी अपनी निगाहें बचाकर रखें और अपने यौवनंगों की रक्षा करें। और अपने शृंगार प्रकट न करें, सिवाय उसके जो उनमें खुला रहता है। और अपने सीनों (वक्षस्थल) पर अपने दुपट्टे डाल रहें और अपना शृंगार किसी पर ज़ाहिर न करें सिवाय अपने पतियों के या अपने करीबी नातेदारों या उन बच्चों के जो स्त्रियों के परदे की बातों से परिचित न हों। और स्त्रियाँ अपने पाँव धरती पर मारकर न चलें कि अपना जो शृंगार छिपा रखा हो, वह मालूम हो जाए। ऐ ईमानवालो! तुम सब मिलकर अल्लाह से तौबा करो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो।

सूरह 33 अल अहजाब आयत 59 में कहा गया है:-

ऐ नबी! अपनी पत्नियों और अपनी बेटियों और ईमानवाली स्त्रियों से कह दो कि वे अपने ऊपर अपनी चादरों का कुछ हिस्सा लटका लिया करें। इससे इस बात की अधिक सम्भावना है कि वे पहचान ली जाएँ। अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।

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हिजाब और बिना हिजाब फर्क दिखाती एक तस्वीर
मुहम्मद इब्न अल उथैमीन जैसे कुछ सलाफी विद्वानों का मानना है कि सभी वयस्क महिलाओं के लिए हाथ और चेहरे को ढंकना अनिवार्य है। ये आवश्यकताएं गैर-मुस्लिम महिलाओं के आसपास भी होती हैं, इस डर से कि वे असंबंधित पुरुषों के लिए उनकी शारीरिक विशेषताओं का वर्णन कर सकते हैं। और ऐसा देखा भी जाता है कि अक्सर कोई पुरुष किसी अज्ञात महिला को देखता है तो उसके शारीरिक बनावट पर अमर्यादित कटाक्ष करता है।
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ऋग्वेद में हिजाब(पर्दे) से संबंधित श्लोक
आइए देखते हैं अन्य धर्मों में औरतों के पर्दे (हिजाब) के बारे में क्या कहा गया है?
ऋग्वेद, मण्डल नं. 8, सूक्त नं. 33, मंत्र नं. 19′ में कहा गया है: 
“अ॒धः प॑श्यस्व॒ मोपरि॑ संत॒रां पा॑द॒कौ ह॑र। 
मा ते॑ कशप्ल॒कौ दृ॑श॒न्त्स्त्री हि ब्र॒ह्मा ब॒भूवि॑थ॥”
भावार्थ – स्त्री सदैव विनम्रता से आचरण करे, वह कभी उद्धत न हो, साथ ही लज्जा का भाव ले कर वह चले-फिरे, वह कभी निर्लज्ज न हो,वह चलते समय पैर फैला कर अथवा लम्बे-लम्बे डग भरकर न चले,बल्कि पैर सटा कर और छोटे छोटे डग भर कर चले ! *उसके शरीर के सभी अवयव अच्छी प्रकार ढके रहें ! स्त्री का यदि कोई भाग खुला रहेगा,तो उसे देख कर पुरुषों के मन मे कुभाव जागेंगे तथा कामवासना उतपन्न होगी,अता स्त्री के शरीर के सभी अवयव ढके रहें इस मंत्र में स्त्रियों के लिए उत्तम उपदेश है*
1) वेदभाष्यकार पंडित ईश्वरचंद्र कन्हैयालाल जोशी ने इस श्लोक का अर्थ इस प्रकार किया है-

‘(अंतरिक्ष से आते हुए इंद्रदेव ने प्लयोग के पुत्र से, जो स्त्री हो गया था, कहा-) कि हे प्लयोग के पुत्र! आप स्त्री होकर नीचे देखिए (यह स्त्री का धर्म है) ऊपर मत देखिए। अपने पैरों को आप संश्लिष्ट (करीब) रखिए (छितराकर नहीं) तथा आपके मुख और पिंडलियों को पुरुष न देखें (इन्हें ढँककर रखिए) क्योंकि आप पहले ब्राह्मण होकर अब स्त्री बन गयी हैं।’

2) पंडित रामगोविन्द त्रिवेदी, वेदांतशास्त्री ने संबंधित श्लोक का अर्थ इस प्रकार किया है-

‘(इंद्र ने कहा) प्रायोगि, तुम नीचे देखा करो, ऊपर नहीं।
(स्त्रियों का यही धर्म है) पैरों को संकुचित रक्खो (मिलाए रक्खो)।
(इस प्रकार कपड़े पहनों कि) तुम्हारे कश (ओष्ठ प्रान्त) और प्लक (नारी-कटि का निम्न भाग) को कोई देखने नहीं पावे। यह सब इसलिए करो कि तुम स्तोता होकर भी स्त्री हुए हो।’

3) डॉ गंगा सहाय शर्मा ने इस श्लोक का अर्थ इस प्रकार किया है-
‘इंद्र ने कहा- हे प्रायोगि, तुम नीचे देखो, ऊपर मत देखो। तुम पैरों को आपस में मिलाओ, तुम्हारे होठों एवं कमर को कोई ना देखे, तुम स्तोता होते हुए भी स्त्री हो।’

4) आचार्य वेदांत तीर्थ ने इस श्लोक का अर्थ इस प्रकार किया है-
‘इंद्र ने कहा है कि, हे प्रायोगिके! तू ऊपर नहीं बल्कि ऊपर की ओर दृष्टि रख। धीरे धीरे चलते समय तेरे दोनों अंग, मुंह एवं पिंडलियां दिखाई ना पड़े। तू शापवश स्त्री बना है।’
5) पंडित हरिशरण सिद्धांतालंकार (आर्यसमाजी विद्वान) ने दिए गए लिंक पर इस श्लोक के अंतर्गत इस प्रकार अर्थ लिखा है- 

गत मंत्र के अनुसार स्त्री का महत्व अधिक है, तो भी उसे नम्र तो होना ही चाहिए। इसी में उसकी प्रतिष्ठा है। मंत्र कहता है कि- नीचे देख, ऊपर नहीं। तेरे मे अकड़ ना हो। तू घर में शासन करने वाली अवश्य है पर तू पाँओं को मिलाकर रखनेवाली हो, असभ्यता में पाँव के फैला के न फिर। इस प्रकार तू वस्त्रों (से) अपने को ठीक प्रकार से आवृत कर जिससे तेरे टखने व निचले अंग नहीं दीखें। वस्त्रों से तू अपने को ठीक प्रकार से आवृत कर जिससे तेरे निचले अंग दिखते न रहें। वस्तुत: इस प्रकार के आचरणवाली स्त्री निश्चय से गृहस्थयज्ञ में ब्रह्म (सर्वमुख्य ऋत्विज) होती है। इसी ने इस यज्ञ को निर्दोष बनाना है।’

कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार इस्लाम ने औरतों को अंग-प्रदर्शन करने से मना किया है और अपने शरीर को पर-पुरुष के सामने ढकने का आदेश दिया है ठीक उसी तरह वैदिक शिक्षाओं के अंतर्गत औरतों को भी उपदेश दिया गया है।
पर्दे से संबंधित एक चर्चित हास्य चित्र
संबंधित श्लोक का अनुवाद लोगों ने भिन्न-भिन्न किया है परंतु सबका भावार्थ समान है कि स्त्री को अपना अंग-प्रदर्शन नहीं करना चाहिए तथा मुंह, होंठ और पिंडलियों को छिपाए।
पर्दा के विषय में यह जानना जरूरी है कि पर्दा (हिजाब) है क्या.?? सरल अर्थों में ‘शारीरिक अंगों विशेषकर गोपनीय या छिपाने योग्य अंगों को वस्त्रादि से छिपाना’ है। कुछ लोगों ने कहा कि हमारे पास अमुक विद्वान का वेद-भाष्य है परंतु इसमें वस्त्रों से ढकने या ओढ़ने का जिक्र नहीं है तो इसका सादा सा और सरल उत्तर में है कि किसी भी विद्वान का भाष्य हो परंतु उसमें वस्त्र शब्द हो या ना हो लेकिन अंग-प्रदर्शन ना करने का आदेश जरुर है कि वो लोगों को अपना होंठ और कमर आदि ना दिखाएं…तो इसके लिए चेहरे पर और शरीर पर वस्त्र आदि डालना ज़रुरी है तभी संभव है कि लोग उसके इन भागों को ना देख पाएं।
ऋग्वेद के अनुसार औरतों को पर्दे में कौन सा भाग छिपाना है इसके लिए मूल मंत्र में ‘कशप्लकौ’ शब्द आया है जिसका अर्थ ‘होंठ और पिंडलियां’ है।
इसी चीज को अल्लाह ने कुरान के सूर्य नूर में आयत नंबर 31 में कहा है कि-
‘और ईमानवाली औरतों से कह दो कि वो अपनी निगाहें बचाकर रखे और अपने गुप्तांगों की रक्षा करें और अपने श्रृंगार प्रकट ना करें सिवाय उसके जो उनमें खुला रहता है। और अपने सीनों पर अपने दुपट्टे डाले रखे और अपना श्रृंगार किसी पर प्रकट ना करें।
गैर मर्दों से पर्दा करती हुई भारतीय महिलाएं

एक नजर घूंघट पर:- आम तौर पर जब महिला का विवाह हो जाता है तो वह अपने ससुराल के बड़े बुजुर्गों तथा गैर मर्दों से पर्दा करने हेतु घूंघट करती है। घूंघट में अपने साड़ी के पल्लू या अन्य परिधान के दुपट्टे/चुन्नी/चुनरी से अपने सर और चेहरे को ढंका जाता है। घूंघट संस्कृत शब्द अवगुण्ठन से लिया गया है जिसका अर्थ है छुपाना या पर्दा करना। 

घूंघट में शादी की रस्म अदा करती हुई भारतीय नारी
गुप्त काल के बाद , मच्छकटिका के लेखक शूद्रक ने उल्लेख किया है कि कुछ महिलाओं ने एक घूंघट (अवगुन्थाना) पहना था। इसे शादी जैसे खास मौकों पर या बाहर जाते समय पहना जाता था। शद्रका ने नोट किया कि एक विवाहित महिला से सार्वजनिक रूप से चलते समय घूंघट डालने की उम्मीद की जाती थी।
गुप्त -अवधि में महिलाओं का चित्रण, 320 CE-550 CE, उत्तर प्रदेश , भारत।
प्रतिमानटक में, भासा (3 - 4 सीई) के एक नाटक में अवगुणथन लबादा-घूंघट के संदर्भ में वर्णन किया गया है कि " महिलाओं को बिना किसी दोष के [संबंधित पक्षों के लिए] एक धार्मिक सत्र में, विवाह उत्सव में, घूंघट के साथ देखा जा सकता है। यही भावना नागानंद और प्रियदर्शिका में हर्ष द्वारा अधिक उदारतापूर्वक व्यक्त की गई है , जहां युवतियों से पर्दा नहीं करने की अपेक्षा की जाती थी; इसे शादी के बाद ही दान किया गया था। बाद में, शिशुपालवध और दशकुमारचरित में, घूंघट को उसी शब्द, अवगुन्थाना द्वारा संदर्भित किया गया था। टीकाकार शंकर के अनुसार, स्थानीश्वर की महिलाएं अपने चेहरे को घूंघट से ढँकती थीं । 
घूंघट(पर्दे) में वोट देने के लिए लाइन में लगी महिलाएं
रामायण में घूंघट परदे जा जिक्र
वाल्मीकि की रामायण में 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी सीई के बीच, राजकुमार राम ने अपनी पत्नी सीता को खुद का अनावरण करने के लिए कहा ताकि अयोध्या के एकत्रित नागरिक वन में निर्वासन में जाने से पहले उन पर एक नज़र डाल सकें; इससे यह साबित होता है कि सीता माता भी घूंघट या परदे में थीं लेकिन भविष्य में होने वाली महारानी के कारण प्रजा के सम्मुख अपनी पहचान बताने के लिए उनको अपना पर्दा हटाना पड़ा था।
महाकाव्य के अंत में, रावण की मृत्यु की खबर सुनकर, उसकी रानियाँ विलाप करने के लिए अपने अवगुणथाना के बिना बाहर भाग जाती हैं, जिसमें मुख्य रानी मंदोदरी उनकी लाश के चारों ओर कहती हैं "तुम क्‍यों नहीं क्रोध करते, कि मुझे देख कर, मेरा परदा हटाकर, नगर के फाटक के पास से पैदल निकल जाते हैं? क्या तू अपनी पत्नियों को देखता है, जिन्होंने अपने परदे उतार दिए हैं? उन सब को शहर से बाहर आते देख तुम क्रोधित क्यों नहीं होते? इस प्रकार, यह उल्लेखनीय है कि शाही महिलाएं सार्वजनिक निगाहों से बचती थीं और केवल विवाहित महिलाओं द्वारा ही घूंघट पहनने की उम्मीद की जाती थी। 
तीसरी और चौथी शताब्दी ईस्वी के बीच लिखी गई कालिदास द्वारा अभिज्ञानशाकुंतलम में , जब नायिका राजा दुहसंता के महल में अपनी पत्नी का दर्जा लेने के लिए आती है, तो राजा पहले टिप्पणी करता है " का स्विद अवगुणनवती " जिसका अर्थ है " यह परदा कौन है? "और तुरंत उसकी ओर देखने के लिए मना कर देता है, "अनिर्वर्णनीयं परकलात्रम" शब्दों के साथ जिसका अर्थ है " दूसरे की पत्नी का निरीक्षण नहीं किया जाना है।"यह काफी हद तक इंगित करता है कि अवगुणथाना एक सम्मानित विवाहित महिला की निशानी थी, और एक विवाहित औरत का पहनावा था। 
भारतीय संस्कृति और परंपरा में भी पर्दा/घूंघट का जिक्र है।विवाह समारोह के दौरान, दुल्हन अपने माता-पिता द्वारा दिया गया घूंघट पहनती है। बाद में, समारोह के दौरान दुल्हन की सास घूंघट से अपना चेहरा ढक लेती है; इसलिए वह एक साथ अपने माता-पिता और अपने ससुराल वालों द्वारा दिए गए घूंघट को पहनती है, जो एक के घर की सुरक्षा से दूसरे में जाने का प्रतीक है।
विवाह के बाद मुंह दिखाई का रस्म अदा किया जाता है जिसमे दुल्हन के घूंघट को उठाकर गांव की महिलाओं को बहु का चेहरा दिखाया जाता है और उसके बदले में लोग उस विवाहिता को गहने कपड़े या कुछ धन उपहार स्वरूप देते हैं। 
2004 में, भारत मानव विकास सर्वेक्षण (IHDS) ने पाया कि भारत में 55% महिलाएं किसी न किसी रूप में घूंघट का अभ्यास करती हैं, उनमें से अधिकांश हिंदी भाषी राज्यों में हैं।
स्टानापट्ट (स्टानमसुका) ऊपरी शरीर के लिए एक ढीला लपेटा हुआ कपड़ा था। यह प्राचीन भारत में इस्तेमाल की जाने वाली छाती की पट्टी थी। यह प्राचीन काल में महिलाओं का एक साधारण ऊपरी वस्त्र था, जो रोमन महिलाओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मैमिलारे या स्ट्रोफियम के समान था । स्तानपट्ट पोशक (महिलाओं की पोशाक)का एक हिस्सा था कालिदास ने कुरपासिका का उल्लेख है, जो ब्रेस्टबैंड का एक और रूप है जिसे उनके द्वारा उत्तरसंग और स्तानपट्ट का पर्याय बनाया गया है। निचले हिस्सों के इनरवियर को निवि या निवि बंध कहा जाता था ।मल्हार की स्कंदमाता की मूर्ति में स्तानपट्ट और कांचुकी के उपयोग को दर्शाया गया है।प्राचीन समय में यह परिधान मुख्य रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा निपल्स या स्तनों को पूरी तरह से ढकने के लिए उपयोग किया जाता था। इसे अलंकरणों से भी सजाया गया था और उत्तरीय के कई उत्तराधिकारी कपड़ों के साथ पहना जाता था , उदाहरण के लिए, साड़ी । समय के साथ स्तानपट्ट बदल गया; कुछ विकसित रूप चोली या ब्लाउज हैं ।
वर्तमान समय में भारतीय महिलाओं का सभ्य परिधान
पर्दे के विरोध मे जो तर्क सबसे ज्यादा दिया जाता है वह ये कि पर्दा औरतो की गुलामी का प्रतीक है। तो जनाब मैने पूरा इतिहास खंगाल डाला कही नही मिला कि गुलामो को पर्दे मे रखने का रिवाज हो। हां ये जरूर मिला कि पुराने जमाने मे गुलाम औरते बाजार मे बिकने के लिए सज-संवार कर खड़ी की जाती थी।लोग आंखे फाड फाड़कर उनकी खूबसूरती के दाम लगाते थे और दुकानदार उन औरतो को खरीदार को बेचकर अपने पैसे सीधे करता था। क्या आज के फैशन शो, मिस यूनिवर्स और मिस वर्ल्ड जैसे शो यही काम नही कर रहे है। तो फिर औरतो की गुलामी के प्रतीक इस तरह के शो हुए ना कि पर्दा।
कर्नाटक में देवदासी प्रथा के संदर्भ में अखबार में छपी एक खबर
कर्नाटक जैसे राज्य में जहां हिजाब को लेकर इतना विवाद हो रहा है वहीं कुछ स्त्रियों को देवदासी बना कर यौन शोषण किया जा रहा है लेकिन कर्नाटक के जज को शायद धर्म ग्रंथ पढ़ना नहीं आता या पढ़ाया नहीं गया है। या उन्होंने कहीं किसी विशेष संस्था से ग्रंथ पढ़कर फैसला सुनाया था। 
कर्नाटक में देवदासियों की स्थिति दर्शाती एक तस्वीर








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